हिन्दी दिवस 2020 पर निबंध (Nibandh Essay on Hindi Diwas 2020)- डॉ. सूर्यकांत मिश्रा


हिंदी दिवस - राजभाषा राष्ट्रभाषा के लिए अब आंदोलन जरूरी

किसी भी राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा तथा मातृभाषा का होना गौरव की बात होने के साथ ही अत्यधिक सम्मान देने वाला भी होता है। भारत वर्ष पूरे विश्व में अकेला ऐसा देश है, जिसकी धारा ने अनेक संस्कृतियों का जन्म हुआ। यही कारण है कि हमारे देश में अनेक भाषाएं पुष्पित एवं पल्लवित हुई। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमारा देश सदैव विचारों एवं भावनाओं से आंदोलित होता रहा है। इसी भावनाओं एवं विचारों के लिए हमें राष्ट्रभाषा की जरूरत महसूस हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा भी है कि ‘अपनी राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा ही होता है।’ हमारे देश में प्रचलित और पल बढ़ रही सारी भाषाएं हमारी संस्कृति की अलग अलग धाराएं है। सभी मिलकर भारतीय चिंतन और परंपरा को पूर्णता प्रदान करती है। हिंदी देश के विशाल भू क्षेत्र में बोली और समझी जाने वाली भाषा है। अतः इसे राष्ट्रभाषा स्वीकार करने में किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। हमारे देश के स्वप्नकारों ने हिंदी को जनसंपर्क के रूप में अपनाकर उसे राष्ट्र की अस्मिता से जोड़ा और देश को एकता के सूत्र में बांधने की श्रृंखला माना।


किसी भी देश की प्रगति एवं एकता तथा अखंडता एक राष्ट्रभाषा के अभाव में संभव नहीं है। इस बात को सबसे पहले स्वतँत्रता आंदोलन के दौरान महसूस किया गया। जहां एक ओर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ विदेशी दासता की परिचायक अंग्रेजी भाषा को समाप्त करने की आवश्यकता महसूस हुई, जो भारत में विभिन्न भागों के लोगों द्वारा विचार बन सके। ऐसी भाषा को राष्ट्रभाषा के नाम से अभिहित किया गया। जिसमें निम्नांकित गुण शामिल हो-


1. वह राष्ट्र के बहुसंख्यकों द्वारा बोली जाती हो।
2. वह राष्ट्र की सांस्कृतिक एवं भाषिक विरासत की सशक्त उत्तराधिकारिणी हो।
3. उसकी शब्द सामर्थ्य एवं अभिव्यंजन क्षमता उत्कृष्ट हो।
4. उसकी न्यायकरणिक क्षमता सरल, बोधगम्य एवं वैज्ञानिक हो।
5. उसका व्यापक क्षेत्रीय विस्तार हो।
6. उसकी प्रवृत्ति विकासोन्मुखी हो जिससे नये शब्दों एवं ध्वनियों को आत्मसात कर सके।
7. उसकी अपनी पूर्ण वैज्ञानिक लिपि हो।


हमारी हिंदी भाषा में उपर्युक्त सभी गुण मौजूद होने से उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। हिंदी भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई भाषा है तथा भारत के किसी कोने का शिक्षित वर्ग एवं अधिकांश जनमानस इसे लिख सकता है या समझ सकता है। इसकी इसी विशेषता के कारण भारत आने वाली इसाई मिशनरियों ने इसे अपने धर्म प्रचार का माध्यम बनाया। इसके लिए उन्होंने हिंदी में व्याकरण ग्रंथ लिखे, शब्द कोष तैयार किये एवं अपने धार्मिक ग्रंथों का हिंदी भाषा में अनुवाद किया।


हिंदी की वास्तविक स्थिति के अवलोकन हेतु राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा का अंतर तथा संवैधानिक स्थिति को समझना जरूरी है। प्रायः आमजनों में यह धारण है कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा दोनों एक ही अर्थ रखते है, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है। गहराई में झांका जाए तो राष्ट्रभाषा राष्ट्र की परंपराओं, रीति रिवाजों एवं भावनाओं के साथ संपूर्ण राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति की संवाहक है, जबकि राजभाषा का अर्थ राज्य की भाषा तक सीमित है अर्थात ऐसी भाषा जो शासन-प्रशासन के कामकाज में प्रयुक्त होती हो। राष्ट्र भाषा के लिए यह अनिवार्यता है कि वह सदैव किसी स्वदेशी भाषा से संबंधित होती है, जबकि राजभाषा के लिए यह अनिवार्यता नहीं है। स्वतंत्रता के बाद किये गये प्रावधानों में यह लिखा जाना कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी राजभाषा (संपर्क भाषा) के रूप में चलती रहेगी और इसके बाद हिंदी को पूर्णतः राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिया जाएगा। महज इसलिए प्रावधान स्वरूप रखा गया ताकि 15 वर्षों में अहिंदी भाषा क्षेत्र के लोग हिंदी सीख ले, पर ऐसा नहीं हुआ, और हम आज भी अपनी मातृभाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मानजनक स्थान नहीं दिला पाए। हमारी राष्ट्रभाषा समिति में शामिल हमारे देश के कर्णधारों ने एक और बंटाधार संविधान के अनुच्छेद 343 (3) में कर दिया और यह उल्लेखित और कलमबद्ध कर दिया गया कि उक्त 15 वर्ष की अवधि के पश्चात भी संसदविधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का प्रयोग ऐसे प्रयोजनों के लिए कर सकेगी, जैसा की विधि में उल्लेखित हो। यह एक षड्यंत्र ही था कि जिसके चलते हिंदी के विकास को रोक दिया गया।


आज स्वतंत्रता के 68 वर्ष संपन्न कर लेने के बाद भी हमने अपनी मातृभाषा के साथ न्याय नहीं किया, उसे सिहासन प्रदान नहीं कर सके, तो इसमें कमजोरी हमारी अपनी ही है। अंग्रेज तो चले गये किंतु अंग्रेजी का ऐसा बीज बो गये, जिसे हम भारतीय अपने दिमाग से नहीं निकाल पा रहे है। जिस प्रकार खरपतवार को बार-बार छांटने के बाद भी वह खेत की फसलों के बीच निकल ही आती है, यदि उसे न हटाया जाए तो फसल का विकास रूक जाता है। ठीक उसी तरह अंग्रेजी बोल चाल की खरपतवार ने प्यारी और मीठी हिंदी भाषा की फसल को बढ़ने नहीं दिया है। हमारे नौनिहालों को भी हम पैदाईशी के साथ ही क, ख, ग, घ के स्थान पर ए, बी, सी, डी और मातृभूमि की सुंदर रचित कविताओं के स्थान पर अंग्रेजी की पोयम ही पढ़ाते आ रहे है। हिंदी भाषा वास्तव में अंग्रेजी की तुलना में कठिनाई लिए हुए है। इसमें प्रमुख रूप से वर्तनी की अनेक रूपता प्रमुख है, जो हिंदी भाषियों के लिए भी कठिनाई उपस्थित कर देती है। फिर अहिंदी भाषियों के लिए इसे समझना तो और भी कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए सुनिए-सुनिए, गयी-गई, आईये-आईए, गये-गए आदि में कोई अंतर न होना अहिंदी भाषियों को तंग कर रहा है।


वर्तमान में हिंदी भाषा को लेकर जितनी कठिनाई का रोना रोया जा रहा है, वास्तव में उतना कुछ है नहीं। अब विज्ञान जैसे विषयों की पुस्तकों का लेखन भी हिंदी में होने लगा है। इतना ही नहीं अनेक विश्व विद्यालयों में हिंदी को ही विज्ञान जैसी पढ़ाई का आधार भी बनाया जा रहा है। जिस प्रकार से अंग्रेजी लिखने और बोलने के लिए आम लोगों द्वारा इच्छा शक्ति के द्वारा प्रशिक्षण कक्षाओं में प्रवेश लिया जा रहा है, ठीक उसी तरह हिंदी के लिए भी प्रयास होना चाहिए। यह दावे के साथ कहा जा सकता है जितना समय अंग्रेजी को सीखने में लगता है, उससे कहीं कम समय में हिंदी को समझा और सीखा जा सकता है। हिंदी को लेकर सबसे अधिक विरोध दक्षिण भारतीयों ने किया है। दक्षिण भारतीय भाषाओं कन्नड़, तमिल, तेलगु आदि का उद्गम स्त्रोत संस्कृत ही है। इसे स्वयं दक्षिण भारतीय स्वीकार करते है। इसी तरह हिंदी की जननी भी संस्कृत ही है। हिंदी में प्रयुक्त होने वाले बहुत से तत्सम शब्द दक्षिण भारत की भाषाओं में प्रयुक्त तत्सम से मिलते जुलते है। तब दक्षिण भारत में निवास करने वालों को हिंदी सीखने में कठिनाई नहीं आनी चाहिए। इस मामले में हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेदौड़ा ने उक्त भ्रम को समाप्त कर दिया कि हिंदी सीखना कठिन है। स्वयं श्री देवेगौड़ा ने बहुत कम दिनों में हिंदी न केवल सीखी, बल्कि अच्छे ढंग से हिंदी में उद्बोधन भी देने लगे। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने शासकीय स्तर पर ऐसी मानसिकता में परिवर्तन लाना जरूरी है कि हिंदी कठिन भाषा है।
- प्रस्तुतकर्ता
(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)